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बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी की पहली ई-बुक का विमोचन

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            दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, उरई के शिक्षाशास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो0 सत् चित् आनन्द द्वारा लिखित ई-बुक का विमोचन आज 6 सितम्बर 2012 को बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झांसी के कुलपति प्रो0 एस0वी0एस0 राणा के करकमलों से हुआ। यह बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झांसी की पहली ई-बुक है। प्रिसिंपल ऑफ एजूकेशननामक इस ई-बुक में प्रो0 सत् चित् आनन्द द्वारा बी00 प्रथम वर्ष के प्रथम प्रश्नपत्र के पाठ्यक्रम को समाहित किया गया है। विश्वविद्यालय कैम्पस में एक सादा समारोह में विमोचन करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति ने प्रो0 आनन्द के इस प्रयास की सराहना की और कहा कि आज के तकनीकी भरे दौर में इस तरह के कदमों की आवश्यकता है। इससे न केवल विद्यार्थियों को लाभ होगा वरन् विश्वविद्यालय तथा सम्बन्धित महाविद्यालय की गरिमा भी बढ़ती है। बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से सम्बन्धित इस पहली ई-बुक के आने से विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट का पुस्तकालय भी समृद्ध होगा। आने वाले दिनों में यदि विश्वविद्यालय और महाविद्यालय के समस्त प्राध्यापक अपने-अपने विषय से सम्बन्धित पाठ्यक्रम के आधार पर ई-बुक का निर्माण करें तो इससे विद्यार्थियों के समक्ष पाठ्यक्रम से सम्बन्धित अध्ययन सामग्री का अभाव नहीं रह जायेगा।

            बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झांसी की पहली ई-बुक के लेखक प्रो0 सत् सित् आनन्द ने बी00 प्रथम वर्ष के प्रथम प्रश्नपत्र पर आधारित अपनी इस पुस्तक के बारे में विस्तार से कुलपति और सभाकक्ष में उपस्थित समस्त लोगों को समझाया। प्रो0 आनन्द ने कुलपति महोदय को इस जानकारी से भी अवगत करवाया कि बी00 प्रथम, द्वितीय, तृतीय वर्ष के समस्त प्रश्नपत्रों के पाठ्यक्रम को ई-बुक के रूप में लाने का कार्य चल रहा है और शीघ्र ही ये समस्त ई-बुक विद्यार्थियों के अध्ययन हेतु उपलब्ध होंगी।




            बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष डॉ0 अरुण कुमार श्रीवास्तव ने प्रो0 आनन्द की जागरूकता की प्रशंसा की और कहा कि उन्होंने हमेशा छात्रहित के कार्य किये हैं और इस ई-बुक के निर्माण से भी छात्रों को लाभ पहुंचेगा। इसी के साथ डॉ0 श्रीवास्तव ने कुलपति महोदय का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके द्वारा विश्वविद्यालय की पहली ई-बुक का विमोचन किये जाने से अन्य जागरूक और सक्रिय प्राध्यापकों में भी उत्साह का संचार होगा और इसका लाभ समृद्ध पुस्तकालय के रूप में हमारे सामने आयेगा।
            0प्र0 राजनीतिविज्ञान परिषद् के प्रदेश अध्यक्ष डॉ0 आदित्य कुमार ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे तकनीकी भरे कार्य सदैव से प्रो0 आनन्द के करकमलों से होते रहे हैं। आज इस ई-बुक के रूप में बुन्देलखण्ड के शैक्षिक वातावरण के लिए एक मील का पत्थर रखा गया है। आने वाले दिनों में प्रो0 आनन्द के इस कार्य से प्रोत्साहन लेकर अन्य प्राध्यापक भी बुन्देलखण्ड के शैक्षिक वातावरण को उन्नत करने में अपना योगदान देंगे।
            गांधी महाविद्यालय, उरई के शिक्षाशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ00 पी0 शर्मा ने कहा कि आज का दिन समूचे बुन्देलखण्ड के लिए गौरव का दिन है और व्यक्तिगत रूप से हमारे लिए इसलिए भी गौरव और प्रसन्नता का विषय है कि विश्वविद्यालय की पहली ई-बुक उनके अपने विषय में आई है। कुलपति जी के सकारात्मक रवैये से आने वाले दिनों में अन्य विषयों में भी ई-बुक की रचना की जायेगी।
            ई-बुक के विमोचन समारोह में उक्त लोगों के अतिरिक्त प्रो0 सत् चित् आनन्द की धर्मपत्नी श्रीमती सुमन आनन्द, डी0वी0 कॉलेज, उरई की संगीत विभागाध्यक्ष डॉ0 वीणा श्रीवास्तव, बूटा महामंत्री डॉ0 टी0 के0 शर्मा, विश्वविद्यालय कैम्पस, समाज अध्ययन विभागाध्यक्ष डॉ0 नईम बॉबी, स्ववित्तपोषित महाविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष डॉ0 राजीव कुमार, पी-एच0डी0 होल्डर्स एसोसिएशन के संयोजक डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर सहित कई अन्य प्राध्यापक तथा विश्वविद्यालय कर्मचारीगण भी उपस्थित रहे।


वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग की कार्यशाला - प्रथम दिवस

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‘‘हिन्दी और अन्य भाषाओं में तकनीकी शब्दावली का विकास करने के लिए सन् 1961 में वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग की स्थापना की गई। इस आयोग का मुख्य कार्य हिन्दी के लिए पारिभाषिक तथा तकनीकी शब्दों का निर्माण करना है। विषय-विशेषज्ञों द्वारा आपसी विचार-विनिमय के बाद अंग्रेजी शब्दों का अनुवाद कर हिन्दी शब्दों का निर्माण किया जाता है।’’ उक्त विचार वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग, नई दिल्ली के वैज्ञानिक अधिकारी डा0 शिवकुमार चौधरी द्वारा व्यक्त किये गये। डा0 शिवकुमार चौधरी यहाँ दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, उरई द्वारा आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला के प्रथम दिन दिनांक 19 जनवरी 2010 में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित थे। ‘मानविकी और समाजविज्ञान में तकनीकी शब्दावली की उपयोगिता’ विषय पर आयोजित कार्यशाला में डा0 चौधरी ने कहा कि कंठलंगोट, लौहपथगामिनी, ध्रूमदण्डिका जैसे शब्द आयोग द्वारा नहीं बनाये गये हैं। ऐसे शब्दों को लोग आपस में हास-परिहास द्वारा प्रयोग करते हैं। आयोग शब्द को सर्वमान्य रूप में स्वीकार करने की ओर बल देता है।
(शिवकुमार चौधरी, मुख्य वक्ता)
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स्थानीय संयोजक डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव ने विषय की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अनुवाद के कार्य में तथ्यों और संवेदना का ध्यान रखा जाना चाहिए। अनुवाद मात्र इस कारण से न हो कि किसी अंग्रेजी शब्द को हिन्दी में बनाना है। बहुत से अंग्रेजी एवं अन्य भाषाओं के शब्द हम रोजमर्रा के कार्यों में प्रयोग करते हैं और वे अब अन्तरराष्ट्रीय रूप में भी मान्य हैं, उन्हें उसी रूप में प्रयोग करना चाहिए जैसे-रेडियो, प्लेटफार्म, बस, टिकट, पेंशन आदि।
(वीरेन्द्र सिंह यादव, स्थानीय संयोजक)
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मुख्य अतिथि डा0 देवेन्द्र कुमार ने कहा कि शब्दों को जीवन में आवश्यक माना जाता है क्योंकि एक व्यक्ति जन्म से अन्तिम समय तक शब्दों के द्वारा ही अभिव्यक्ति करता रहता है। इस कारण शब्दों का सही और मान्य स्वरूप ही प्रयोग करना चाहिए।
(देवेन्द्र कुमार, मुख्य अतिथि)
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इस अवसर पर डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘इक्कीसवीं सदी का भारत: मुद्दे, विकल्प और नीतियाँ’ का भी विमोचन किया गया।
(पुस्तक विमोचन)
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पुस्तक पर प्रकाश डालते हुए डा0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने बताया कि इस पुस्तक में 69 लेख विभिन्न विषयों से सम्बन्धित हैं। इसमें अर्थव्यवस्था, पंचायती राज, जनसंख्या वृद्धि, समलैंगिकता, कन्या भ्रूण हत्या, आपदा नियंत्रण, बाल विकास आदि विशेष हैं। इन लेखों के द्वारा आम आदमी के जीवन से लेकर भूमण्डलीकरण, आधुनिकता, जनसंचार, पत्रकारिता आदि की व्यापक चर्चा की गई है।
(पुस्तक पर चर्चा करते कुमारेन्द्र)
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डी0वी0 कालेज, उरई के प्राचार्य डा0 अनिल कुमार श्रीवास्तव ने गोष्ठी की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शब्दों के मानक रूप के प्रयोग करने से सभी को सुविधा होती है। इससे आपसी चर्चा में भी दिक्कत की स्थिति नहीं आती है।
(अनिल कुमार श्रीवास्तव, प्राचार्य)
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कार्यशाला की अध्यक्षता कर रहे डा0 हरीमोहन पुरवार ने कहा कि कुछ शब्द समय के साथ लुप्त हो जाते हैं। यह बात इसको सिद्ध करती है कि शब्दों का भी एक व्यक्ति की तरह से जीवन होता है। वह भी समय के साथ जीवित रहता है और मृत्यु को प्राप्त होता है। उदाहरण के लिए मोटरसाइकिल के लिए कभी उपयोग होने वाला फटफटिया शब्द आज बिलकुल नहीं सुनाई देता है। इसी तरह पलंग के लिए इस्तेमाल होने वाला खटिया अब कम से कम सुनाई देता है। शब्दों को जीवित रखने के लिए आवश्यक है कि उनका लगातार प्रयोग किया जाता रहे।
(हरिमोहन पुरवार, अध्यक्ष)
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तकनीकी सत्र में डा0 एस0 पी0 सक्सेना, पूर्व उप-निदेशक, वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग, ने शब्दों के प्रयोग, उनके अर्थ पर व्यापक चर्चा की। उन्होंने वर्कशाप शब्द को स्पष्ट करते हुए कहा कि इस शब्द को कार्यशाला, कर्मशाला के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ यह ध्यान रखना होगा कि जब बौद्धिक चर्चा होती है वहाँ कार्यशाला शब्द का प्रयोग होगा और जहाँ आटोमोबाइल की बात होगी वहाँ कर्मशाला का उपयोग होगा। इसी तरह उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय शब्द के बारे में बताते हुए कहा कि जब एक देश के भीतर की ही बात हो तो वहाँ अन्तर्राष्ट्रीय शब्द का प्रयोग होगा और जब दो देशों के आपसी सम्बन्धों की बात की जाये तो वहाँ अन्तरराष्ट्रीय शब्द लिखा जायेगा।
(एस पी सक्सेना, पूर्व उप निदेशक)
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इस सत्र के विषय-विशेषज्ञ, डी0वी0 कालेज के डा0 आदित्य कुमार ने कहा कि आयोग हिन्दी के प्रामाणिक शब्द तो बना रहा है किन्तु वे अभी जनसामान्य में ज्यादा प्रचलित नहीं हैं। इसके लिए आयोग का यह कार्य होना चाहिए कि वह शब्दों को जन सामान्य तक भी पहुँचाने का प्रयास करे। बच्चों को भी बचपन से पाठ्यक्रम के द्वारा मान्य शब्दों से परिचय करवाया जाना चाहिए, बच्चों के लिए बनाई जा रही वैज्ञानिक फिल्मों में भी तकनीकी शब्दावली का प्रयोग किया जाना चाहिए।
(आदित्य कुमार, विषय-विशेषज्ञ)
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तकनीकी सत्र की अध्यक्षता कर रहीं डा0 जयश्री पुरवार ने कहा कि आयोग शब्दों के स्वरूप निर्धारण को लेकर बहुत ही अच्छा काम कर रहा है किन्तु इसके बाद भी ये शब्द जन जन तक नहीं पहुँच पा रहे हैं। कुछ शब्द तो इतने कठिन होते हैं कि उनको समझने में भ्रम की स्थिति पैदा होती है। इस बारे में भी आयोग को ध्यान देना चाहिए।

कार्यशाला में ऋषिकेश से डा0 पूजा त्यागी, बरेली से डा0 दयाराम, झाँसी से डा0 किशन यादव, कानपुर से डा0 मनोरमा, दिल्ली से डा0 जयसिंह, डा0 ब्रजेश सिंह, ललितपुर से डा0 पुनीत बिसारिया, लखनऊ से डा0 रिपुसूदन सिंह के अतिरिक्त स्थानीय प्रतिभागी और विद्वतजन् भी उपस्थित रहे।

कार्यशाला के उदघाटन सत्र का संचालन डा0 अलकारानी पुरवार ने तथा तकनीकी सत्र का संचालन डा0 आनन्द खरे ने किया।
(अलका रानी पुरवार, संचालक)
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विचार गोष्ठी, पुस्तक विमोचन एवं सम्मान समारोह का आयोजन

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"जीवन मूल्य सास्वत होते हैं। इनमें परिवर्तन यदि होते हैं तो हमारे पहनावे, विचारों और रहन सहन के कारण होते हैं। समाज में जीवन मूल्यों का निर्धारण व्यक्ति के आचार विचार और पठन पाठन से होता है। इस प्रक्रिया में पुस्तकें अपना योगदान देतीं हैं।" उक्त विचार सामाजिक संस्था दीपशिखा द्वारा सिटी सेन्टर उरई में आज दिनांक 05 जनवरी 2010 को आयोजित विचार गोष्ठी, पुस्तक विमोचन एवं सम्मान समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में नगर निगम आयुक्त झाँसी जे0 पी0 चौरसिया ने व्यक्त किये।

(मुख्य अतिथि - नगर निगम आयुक्त झाँसी जे0 पी0 चौरसिया)


बदलते जीवन मूल्य और साहित्य विषय पर आयोजित गोष्ठी तथा काव्य संग्रह ‘अनुभूतियाँ’ के विमोचन कार्यक्रम में जे0 पी0 चौरसिया ने आगे कहा कि "समाज के बदलते परिवेश में साहित्य में भी बदलाव आते रहे और साहित्य के इसी बदलते स्वरूप से विभिन्न कालों और धाराओं का प्रतिपादन होता रहा है। वर्तमान काव्य संग्रह ‘अनुभूतियाँ’ नई पीढ़ी को एक दिशा प्रदान करेगी।"

(काव्य संग्रह ‘अनुभूतियाँ’ का विमोचन कार्यक्रम)

काव्य संग्रह ‘अनुभूतियाँ’ जनपद के कोंच के युवा साहित्यकार दीपक ‘मशाल’ की प्रथम कृति है। युवा साहित्यकार वर्तमान में ग्रेट-ब्रिटेन में जैव-प्रौद्योगिकी विषय में अपने शोध कार्य को पूरा करने में लगे हैं। विज्ञान पृष्ठभूमि और बिलायती परिवेश के बाद भी दीपक का हिन्दी साहित्य प्रेम कम नहीं हुआ। वर्तमान में वे इण्टरनेट पर ब्लाग के माध्यम से लेखन कार्य में रत हैं।



(काव्य संग्रह ‘अनुभूतियाँ’ की समीक्षा करते डॉ0 आदित्य कुमार)

काव्य संग्रह ‘अनुभूतियाँ’ की समीक्षा करते हुये दयानन्द वैदिक महाविद्यालय उरई के राजनीति विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ0 आदित्य कुमार ने कहा कि "दीपक की कवितायें समाज को दिशा प्रदान करने वालीं दिखाई देतीं हैं। इनकी कविताओं में आम जीवन में घटित हाने वाली घटनाओं की जो अनुभूति है उसे प्रत्येक मनुष्य एहसास तो करता है किन्तु उसे शब्द देने का कार्य बखूबी किया गया है। कविताओं को पढ़ते हुये आम जीवन के चित्र आँखों के सामने बनते दिखाई पड़ते हैं। विषय की गहराई बिम्बों और प्रतीकों का प्रयोग भाव बोध तथा तत्व विधान आदि दीपक को तथा उनकी कविताओं को प्रौढता प्रदान करते हैं जो जनपद के युवा साहित्यकारों के लिये सुखद सन्देश है।"


(काव्य संग्रह अनुभूतियाँ के लेखक दीपक ‘मशाल’)

काव्य संग्रह अनुभूतियाँ के लेखक दीपक ‘मशाल’ ने अपनी काव्य यात्रा और इस काव्य संग्रह के बारे में बताते हुये कहा कि "मेरी कवितायें जीवन की परिस्थितियों और पीडा से उपजी हैं। मेरा प्रयास है कि जीवन की सत्यता को सरल और भावपूर्ण शब्दों में व्यक्त करता रहूँ।"

संस्था दीपशिखा द्वारा इस वर्ष से सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय लोगों को सम्मानित करने की दृष्टि से दो सम्मानों-धनीराम वर्मा सामाजिक क्रांति सम्मान तथा महेन्द्र सिंह सेंगर सामाजिक सक्रियता सम्मान- को प्रारम्भ किया है। धनीराम वर्मा सामाजिक क्रांति सम्मान 2009 जागेश्वर दयाल 1 विकल को देने का निर्णय लिया गया है। इस अवसर पर कोंच के श्री रामबिहारी चौरसिया को महेन्द्र सिंह सेंगर सामाजिक सक्रियता सम्मान 2009 से अलंकृत किया गया।

(श्री रामबिहारी चौरसिया को महेन्द्र सिंह सेंगर सामाजिक सक्रियता सम्मान 2009 से अलंकृत)

श्री चौरसिया जनपद में स्टिल फोटोग्राफी को स्थापित करने वालों में हैं। ज्ञात जानकारी के अनुसार जनपद का पहला तथा झाँसी मण्डल का दूसरा फोटो स्टूडियो नटराज स्टूडियो के नाम से उन्हीं ने खोला था। एस0 आर0 पी0 इण्टर कालेज कोंच में प्रवक्ता पद पर अपनी सेवायें देने के बाद वर्तमान में भी वे फोटोग्राफी से सम्बन्धित तकनीकी ज्ञान देते रहते हैं।

इससे पूर्व बदलते जीवन मूल्य और साहित्य विषय पर एक गोष्ठी का भी आयोजन किया गया। गोष्ठी की शुरुआत तीतरा खलीलपुर महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ0 डी0 सी0 द्विवेदी के वक्तव्य से हुई। डॉ0 द्विवेदी ने कहा "सत्य घटनाओं से नहीं वरन स्थितियों से निर्मित होता है। यही सत्य जब साहित्य में प्रदर्शित होता है तो मूल्यों के रूप में मनुष्य के जीवन में दिखाई देता है। जीवन मूल्य साहित्य को विशेष गरिमा प्रदान करते हैं। वर्तमान भोगवादी संस्कृति में सत्य का निष्पादन कठिन होता प्रतीत हो रहा है। इससे मूल्यों की शाश्वतता भी परिवर्तन आने शुरू हुये हैं। इन्हीं बदलावों के कारण जिस साहित्य को समाज का दर्पण अथवा समाज का निर्माता कहा जाता रहा है उसमें भटकाव आना शुरू हुआ।"



(वरिष्ठ अधिवक्ता यज्ञदत्त त्रिपाठी)

गोष्ठी में वरिष्ठ अधिवक्ता यज्ञदत्त त्रिपाठी ने जीवन मूल्यों को मनुष्य के विकास से जोड़ते हुये कहा कि "आधुनिक विकासवादी प्रवृति मनुष्य को जीवन मूल्यों से परे ले जा रही है। भौतिकवादी संस्कृति और भौतिकतावादी सोच ने सबसे उच्च शिखर पर बैठे मनुष्य को रसातल की ओर ले जाने का कार्य किया है। संसार के समस्त जीवों मे श्रेष्ठ जीवधारी मनुष्य अपने कृत्यों से समाज और साहित्य दोनों से दूर होता जा रहा है इस कारण से जीवन मूल्यों में बदलाव देखने को मिलते हैं।"



(लोक संस्कृति विशेषज्ञ अयोध्या प्रसाद गुप्त कुमुद)

लोक संस्कृति विशेषज्ञ अयोध्या प्रसाद गुप्त कुमुद ने जीवन मूल्यों को लोक संस्कृति से सम्बद्ध करते हुये कहा कि "अपनी संस्कृति से विमुख होने के कारण व्यक्ति जीवन मूल्यों को विस्मृत कर रहा है। साहित्य के द्वारा समाज को दिशा देने का कार्य साहित्यकारों द्वारा किया जाता रहा है परन्तु वर्तमान साहित्य से लोक संस्कृति का लोप होना जीवन मूल्यों को स्वतः ही विघटित कर रहा है। परिवार में आपसी सामन्जस्य और मूल्यों की स्थापना को लेकर भी आज नये नये स्वरूप दिखाई पड़ते हैं। जीवन मूल्यों के शाश्वत स्वरूप में इन विघटन और बदलाव का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।"


(डॉ0 राकेश नारायण द्विवेदी)

गांधी महाविद्यालय उरई के हिन्दी विभाग के प्रवक्ता डॉ0 राकेश नारायण द्विवेदी ने जीवन के क्रिया कलापों और व्यक्ति की सक्रियता को जीवन मूल्य की परिभाषा दी उनका कहना था कि "वर्तमान में साहित्य के द्वारा जो भी रचनात्मक कार्य किये जा रहे हैं वे किसी न किसी तरह के मूल्यों का निर्माण करते हैं। उन मूल्यों को किसी भी स्थिति में जीवन मूल्य नहीं कहा जा सकता जो व्यक्ति और समाज को दिशा प्रदान न कर सकें।"



(डॉ0 हरिमोहन पुरवार)

दयानन्द वैदिक महाविद्यालय उरई की प्रबन्धकारिणी कमेठी के उपाध्यक्ष डॉ0 हरिमोहन पुरवार ने कहा कि "जीवन मूल्य व्यक्ति से जुडी शब्दावली है केवल साहित्य की नहीं। साहित्य से इतर व्यक्ति भी अपने क्रिया कलापों से मूल्यों का निर्माण करता है। सकारात्मक मूल्य समाज को दिशा देते हुये अपने आप में जीवन मूल्य के रूप में परिभाषित होते हैं।"



(डॉ0 आर0 के0 गुप्ता)

दयानन्द वैदिक महाविद्यालय उरई के वनस्पति विभाग के डॉ0 आर0 के0 गुप्ता ने कहा कि "व्यक्ति के कार्य और आचरण में निरन्तर बदलाव आ रहे हैं। जीवन मूल्यों को व्यक्ति के आचरण की पवित्रता से जोड कर देखा जाना चाहिये। आचरण और कार्य की पवित्रता का विरोधाभास अपने आप ही जीवन मूल्यों का क्षरण है। जीवन मूल्यों की स्थापना के लिये व्यक्ति को अपने कार्य और आचरण में सामन्जस्य स्थापित करना चाहिये।"

इसके साथ ही गोष्ठी में डॉ0 रामप्रताप सिंह, डॉ0 सुरेन्द्र नायक, डॉ0 भास्कर अवस्थी ने भी अपने विचार व्यक्त किये। कार्यक्रम में गोष्ठी का संचालन डॉ0 अनुज भदौरिया, पुस्तक विमोचन एवं सम्मान समारोह का संचालन डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने तथा आभार प्रदर्शन डॉ0 राजेश पालीवाल ने किया। समारोह में संस्था के संरक्षक डॉ0 अशोक कुमार अग्रवाल, संस्था उपाध्यक्ष अलका अग्रवाल, डॉ0 सतीश चन्द्र शर्मा, डॉ0 अभयकरन सक्सेना, डॉ0 अलका रानी पुरवार, डॉ0 नीता गुप्ता, डॉ0 बबिता गुप्ता, डॉ0 नीलरतन, डॉ0 सुनीता गुप्ता, डॉ0 ममता अग्रवाल, डॉ0 वीरेन्द्र सिंह यादव, प्रकाशवीर तिवारी, डॉ0 प्रवीण सिंह जादौन, धर्मेन्द्र सिंह, सलिल तिवारी, आशीष मिश्रा, सन्त शिरोमणि, डॉ0 राजवीर, डॉ0 के0 के0 निगम, सुभाष चन्द्रा, डॉ0 मनोज श्रीवास्तव, के साथ साथ कोंच से लोकेश चौरसिया, लक्ष्मण चौरसिया, आगरा से स्वामी चौधरी सहित जनपद के प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।