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मानवाधिकार - कितने प्रासंगिक?

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         आज अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस (Human Rights Day) है. पूरे विश्व में 10 दिसंबर को इसे मनाया जाता है. संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने 10 दिसंबर  1948 को पेरिस में  'मानवाधिकारों की सार्वजनिक घोषणा'  की थी. तबसे इस दिन को ' मानवाधिकार दिवस' के रूप में मनाया जाता है. यह घोषणा एक ऐसा ऐतिहासिक दस्तावेज हैं जो उन अविभाज्य अधिकारों को सुनिश्चित करता हैं जो हर व्यक्ति को एक मानव के रूप में प्राप्त हैं.
         यद्यपि आधिकारिक तौर पर इस दिन को मनाने की घोषणा 1950 में हुई. 1950 में संयुक्त राष्ट्र असेंबली ने सभी देशों को आमंत्रित किया. असेंबली ने 423 (V) रेज़्योलुशन पास कर सभी देशों और संबंधित संगठनों को इस दिन को 'मानवाधिकार दिवस'  के रूप में मनाने की अधिसूचना जारी की . 
         अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस  लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से मनाया जाता है. मानवाधिकार में स्वास्थ्य, आर्थिक सामाजिक, और शिक्षा का अधिकार भी शामिल है. मानवाधिकार वे मूलभूत नैसर्गिक अधिकार हैं जिनसे मनुष्य को नस्ल, जाति, राष्ट्रीयता, धर्म, लिंग आदि के आधार पर वंचित या प्रताड़ित नहीं किया जा सकता. संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा है- " मानवाधिकार शांतिपूर्ण, न्यायपूर्ण और समावेशी समाजों की नींव हैं ."  
         मानवाधिकार दिवस 2024  की थीम हैं, " हमारे अधिकार, हमारा भविष्य, अभी ( Our Rights, Our Future,Right now) '
         भारत में मानवाधिकार कानून  'मानवाधिकारों की सार्वजनिक घोषणा' 1948 के 45 वर्षों बाद   28 सितंबर 1993 में अस्तित्व में आया. जिसके बाद सरकार ने 12 अक्टूबर 1993 को 'राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग' का गठन किया. मानवाधिकार आयोग राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्षेत्रों में भी काम करता है. जैसे मज़दूरी, HIV एड्स, हेल्थ, बाल विवाह, महिला अधिकार. मानवाधिकार आयोग का काम ज्यादा से ज्यादा लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना है. लेकिन भारत में भी साम्प्रदायिकता, क्षेत्रीय असंतुलन जनित संघर्षों और महिलाओं तथा वंचितों के उत्पीड़न की घटनाओं से मानवाधिकारों की स्थिति  चिंतनीय बनी हुई  है.
         आज का वैश्विक परिदृश्य भी मानवाधिकारों का उपहास उड़ाता दृष्टिगोचर हो रहा है.  द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद हुई भीषण जनहानि ने लोकतांत्रिक विश्व का पथ प्रशस्त किया था. मानवाधिकारों की अवधारणा का प्रतिपादन लोकतांत्रिक विश्व में मानव व्यक्तित्व की गरिमा को स्थापित करने  के उद्देश्य से किया गया था. पर  महाशक्तियों की महत्वाकांक्षाओं और निहित स्वार्थों से उपजी प्रतियोगिता ने  विश्व शांति को एक स्वप्न बना दिया. विश्व के अनेक क्षेत्रों में सशत्र संघर्षों ने महाशक्तियों को हस्तक्षेप का अवसर दिया और स्थिति अत्यंत जटिल होती जा रही है. विकास शील देशों में  भी मानवाधिकारों की स्थिति अधिक शोचनीय है.
            वर्तमान में रूस- यूक्रेन युद्ध, इजरायल- हमास, हिजबुल्लाह युद्ध से तृतीय विश्वयुद्ध की आहट आने लगी है.  युद्धों में मानवाधिकारों का व्यापक स्तर पर हनन हो रहा है जिसे रोकने में संयुक्त राष्ट्र संघ भी अप्रासंगिक प्रतीत हो रहा है.   यह स्थिति अत्यंत शर्मनाक एवं चिंतनीय है. सभी देशों  को  गंभीरता से इस समस्या के समाधान के प्रयास खोजने चाहिये.

हर्ष एवं उल्लास का पर्व 'लोहड़ी'

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       हमारे देश की  संस्कृति बहुरंगी एवं विविधतापूर्ण है। इसमें अनेक रीति-रिवाज व परंपराएं समाहित हैं जो लोगों को  एकसूत्र में बाँधती हैं। त्यौहारों की इस परंपरा में माघ महीने की संक्रांति से एक दिन पहले  लोहड़ी (Lohri) का पर्व सारे देश में (मूल रूप से पंजाब में ) उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। 
         लोहड़ी हर्ष और उल्लास का पर्व है। इसका संबंध बदलते मौसम के साथ  है। पौष माह की कड़ाके की ठंड से बचने के लिए भाईचारक सांझ और अग्नि की तपिश का आनंद लेने के लिए 'लोहड़ी ' का पर्व मनाया जाता है।
        ' लोहड़ी'  आपसी संबंधों की मधुरता, आनंद, संतोष और प्रेम का प्रतीक है। दुखों से दूर रह कर, प्यार और भाईचारे से मिल जुलकर नफरत को दूर करने का  प्रतीक  है लोकपर्व  'लोहड़ी'। यह पवित्र अग्नि का त्यौहार मानवता को सीधा रास्ता दिखाने और रुठों को मनाने का सदा से ही माध्यम बनता रहा है और बनता रहेगा। 
          लोहड़ी शब्द  की व्युत्पत्ति ' तिल' और 'रोड़ी ' से मिल कर हुई। समय के साथ  साथ से ' तिलोड़ी' और बाद में 'लोहड़ी'  कहा जाने लगा। 'लोहड़ी' तीन शब्द  - ल (लकड़ी) ,ओह (सूखे उपले) ,और डी (रेवड़ी) की ओर संकेत करते हैं। 
           'लोहड़ी' का पर्व आने पर पहले 'सुंदर मुंदरिए' दे माई लोहड़ी जीवे तेरी जोड़ी' आदि लोक गीत गाकर घर-घर लोहड़ी मांगने का रिवाज था। समय  के साथ 'लोहड़ी'  सहित कई पुरानी परंपराओं का आधुनिकीकरण हो गया है।  अब पंजाब के ग्रामों में      लड़के-लड़कियां लोहड़ी मांगते हुए 'परंपरागत गीत' गाते दिखते। गीतों का स्थान 'डीजे' ने ले लिया।
          लोहड़ी की रात को गन्ने के रस की खीर बनाई जाती है और अगले दिन माघी के दिन खाई जाती है जिसके लिए 'पौह रिद्धी माघ खाघी गई' कहा जाता है। ऐसा करना शुभ माना जाता है।      
          यह त्योहार छोटे बच्चों एवं नव विवाहितों के लिए विशेष महत्व रखता है। लोहड़ी की शाम को  प्रज्ज्वलित लकड़ियों के सामने नवविवाहित युगल अपने वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाए रखने की कामना करते हैं।
          लोहड़ी का संबंध में कई ऐतिहासिक लोक कथायें प्रचलित हैं पर इससे जुड़ी प्रमुख लोककथा 'दुल्ला-भट्टी'  की है जो मुगलों के समय का बहादुर योद्धा था, जिसने मुगलों के बढ़ते जुल्म के खिलाफ कदम उठाया। 
           इस संबंध में जनश्रुति है कि एक ब्राह्मण की दो कन्यायें 'सुंदरी' और ' मुंदरी' थीं।   इलाके का मुगल शासक उनसे बलपूर्वक विवाह करना चाहता था। पर उनकी सगाई कहीं और हुई थी। मुगल शासक के डर से उन लड़कियों के ससुराल वाले शादी करने की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे।
           संकट की इस वेला में 'दुल्ला भट्टी ' ने ब्राह्मण  परिवार की सहायता की । उसने  लड़के वालों को राजी कर  जंगल में आग जलाकर  अपनी देख- रेख में ' सुंदरी 'एव 'मुंदरी 'का विवाह संपन्न करवाया। दुल्ले ने खुद ही उन दोनों का कन्यादान किया। 'दुल्ला भट्टी' ने शगुन के रूप में उन दोनों कन्याओं को शक्कर दी थी। लोहड़ी पर   गाये जाने वाले इस लोकगीत में इस घटना का संदर्भ मिलता है-

'सुंदर-मुंदरिए  हो!  तेरा   कौन   बेचारा हो, 
दुल्ला भट्टी वाला हो, दुल्ले ने धी ब्याही हो।
      सेर शक्कर पाई-हो, कुड़ी दा लाल पटाका हो, 
      कुड़ी दा सालू फाटा हो,   सालू कौन समेटे हो। 
चाचा   चूरी   कुट्टी  हो,जमींदारा लुट्टी हो, 
जमींदार सुधाए-हो, बड़े पोले आए हो। 
इक पोला रह गया-हो, पूरे विश्व में भारतीय संस्कृति अपना एक अलग स्थान रखती है क्योंकि इसमें अनेक रीति-रिवाज व परंपराएं समाई हैं जो लोगों को करीब लाकर एकसूत्र में बांधती हैं। त्यौहारों की इस शृंखला में माघ महीने की संक्रांति से एक दिन पहले आता है लोहड़ी (Lohri) का पर्व। 
         लोहड़ी हर्ष और उल्लास का पर्व है। इसका संबंध मौसम के साथ गहरा जुड़ा है। पौष माह की कड़ाके की सर्दी से बचने के लिए भाईचारक सांझ और अग्नि की तपिश का सुकून लेने के लिए लोहड़ी मनाई जाती है।
        लोहड़ी रिश्तों की मधुरता, सुकून और प्रेम का प्रतीक है। दुखों का नाश, प्यार और भाईचारे से मिल जुलकर नफरत के बीज का नाश करने का नाम है लोहड़ी। यह पवित्र अग्नि का त्यौहार मानवता को सीधा रास्ता दिखाने और रुठों को मनाने का जरिया बनता रहेगा। लोहड़ी शब्द तिल+रोड़ी के मेल से बना है जो समय के साथ बदल कर तिलोड़ी और बाद में लोहड़ी हो गया। लोहड़ी मुख्यत: तीन शब्दों को जोड़ कर बना है ल (लकड़ी) ओह (सूखे उपले) और डी (रेवड़ी)।

'सुंदर मुंदरिए' को लेकर ये है मान्यता
         लोहड़ी के पर्व की दस्तक के साथ ही पहले 'सुंदर मुंदरिए' दे माई लोहड़ी जीवे तेरी जोड़ी आदि लोक गीत गाकर घर-घर लोहड़ी मांगने का रिवाज था। समय बदलने के साथ कई पुरानी रस्मों का आधुनिकीकरण हो गया है। लोहड़ी पर भी इसका प्रभाव पड़ा। अब गांव में           लड़के-लड़कियां लोहड़ी मांगते हुए 'परंपरागत गीत' गाते दिखलाई नहीं देते। गीतों का स्थान 'डीजे' ने ले लिया।
         लोहड़ी की रात को गन्ने के रस की खीर बनाई जाती है और अगले दिन माघी के दिन खाई जाती है जिसके लिए पौह रिद्धी माघ खाघी गई कहा जाता है। ऐसा करना शुभ माना जाता है।      
         यह त्यौहार छोटे बच्चों एवं नव विवाहितों के लिए विशेष महत्व रखता है। लोहड़ी की संध्या में जलती लकड़ियों के सामने नवविवाहित जोड़े अपने वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाए रखने की कामना करते हैं।
          लोहड़ी का संबंध कई ऐतिहासिक लोक कथायें प्रचलित हैं पर इससे जुड़ी प्रमुख लोककथा दुल्ला-भट्टी की है जो मुगलों के समय का बहादुर योद्धा था, जिसने मुगलों के बढ़ते जुल्म के खिलाफ कदम उठाया। कहा जाता है कि एक ब्राह्मण की दो लड़कियां सुंदरी और मुंदरी के साथ इलाके का मुगल शासक जबरन शादी करना चाहता था पर उनकी सगाई कहीं और हुई थी और मुगल शासक के डर से उन लड़कियों के ससुराल वाले शादी के लिए तैयार नहीं हो पा रहे थे।
           इस मुसीबत की घड़ी में दुल्ला भट्टी ने ब्राह्मण की मदद की और लड़के वालों को मनाकर एक जंगल में आग जलाकर सुंदरी एव मुंदरी का विवाह करवाया। दुल्ले ने खुद ही उन दोनों का कन्यादान किया। कहावत है कि दुल्ले ने शगुन के रूप में उन दोनों को शक्कर दी थी। इसी कथनी की हिमायत करता लोहड़ी का यह गीत है जिसे लोहड़ी के दिन गाया जाता है।

'सुंदर-मुंदरिए'  हो  !  तेरा   कौन बेचारा हो, 
दुल्ला भट्टी वाला हो, दुल्ले ने धी ब्याही हो।
     सेर शक्कर पाई-हो, कुड़ी दा लाल पटाका हो, 
     कुड़ी दा सालू फाटा हो,  सालू कौन  समेटे हो। 
चाचा  चूरी   कुट्टी   हो,  जमींदारा   लुट्टी  हो, 
जमींदार   सुधाए-हो,   बड़े   पोले   आए हो। 
     इक        पोला              रह     गया        हो, 
     सिपाही         फड़      के      लै    गया     हो। 
सिपाही   ने   मारी   ईंट, भावें   रो  भावें पिट। 
सानूं   दे   दो   लोहड़ी,      जीवे  तेरी  जोड़ी।'
     'साडे   पैरां   हेठ   रोड़,    सानूं छेती-छेती तोर,
      साडे   पैरां   हेठ  दहीं,  असीं   मिलना वी नईं। 
साडे  पैरां  हेठ  परात,  सानूं  उत्तों पै गई रात। 
दे   माई    लोहड़ी,   जीवे     तेरी        जोड़ी।"
        
        मुगलों के जुल्म के विरुद्ध दुल्ला- भट्टी   के मानवीय साहसिक कार्य को आज भी  '  लोहड़ी' पर स्मरण किया जाता हैं और ' लोहड़ी' को सत्य और साहस की अन्याय पर विजय के रूप में मनाया जाता है।        'लोहड़ी'  कृषि से भी संबंधित  है। इस समय गेहूं और सरसों की फसलें पूरे शबाब पर होती हैं। परंपरा है कि लोहड़ी के दिन गाँवों  युवक- युवतियां अपनी-अपनी टोलियां बनाकर घर-घर जाकर गाते हुए लोहड़ी मांगते हैं-
       'दे  माई  लोहड़ी  ,जीवे तेरी जोड़ी। 
       दे माई पाथी, तेरा पुत चढ़ेगा हाथी। '
          गाँव के लोग उन्हें ' लोहड़ी' के रूप में गुड़, रेवड़ी, मूंगफली तिल या पैसे देते हैं। रात को लोग अग्नि में तिल डालते हुए     
   'ईशर अए दलिदर जाए, दलिदर दी जड़ चुल्हे पाए।' बोलते हुए सभी के  स्वस्थ रहने की प्रार्थना करते हैं।
           जिस घर में नये शिशु का जन्म होता ही है, वहाँ लोहड़ी का पर्व विशेष उत्साह से मनाया जाता है। लोहड़ी की रात सभी गांव वाले नवजात शिशु के घर आते हैं । लकड़ियां, उपले आदि से अग्नि जलाई जाती है। सभी को गुड़, मूंगफली, रेवड़ी, तिल घानी बांटे जाते हैं। अब आधुनिक सोच के व्यक्ति  कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए लड़कियों के जन्म पर भी लोहड़ी मनाते हैं । 'लोहड़ी' की पवित्र आग में तिल डालने के बाद बड़े बुजुर्गों से आशीर्वाद लिया जाता है। 
             इस वर्ष सारा पंजाब 'किसान आंदोलन' से उद्वेलित है।' धरना स्थल 'पर ही  किसान  'लोहड़ी' मनाने जा रहे हैं।  हमें आशा करनी चाहिये कि यह लोहड़ी का पर्व ऐसी खुशियाँ लाये कि देश में शांति व सौहार्द का वातावरण फिर से स्थापित हो। 

हिंदी साहित्य जगत की अनुपम निधि- स्व. गोपाल दास 'नीरज'

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       हिन्दी के लोकप्रिय कवि,  सुमधुर गीतों के राजकुमार, फिल्म जगत में अपने गीतों से विशिष्ठ स्थान बनाने व धूम मचाने वाले ,कालजयी रचनाओं के सृजनकर्ता , कवि सम्मेलन के मंचो के अप्रतिम नायक श्री गोपाल दास 'नीरज' आज द्वितीय पुण्यतिथि है.

     प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कालजयी रचनाओं के कुछ अंश जो जीवन के विविध रंगो का चित्रण करते हैं और एक दिशा देते हैं.

 "कफ़न बढ़ा तो किसलिये,
                            नजर तू डबडबा गयी,
  सिंगार क्यों सहम गया,
                             बहार क्यों लजा गयी,
  न जन्म कुछ,न मृत्यु कुछ,
                             बस बात सिर्फ इतनी है,
  किसी की आँख खुल गयी,
                              किसी को नींद आ गयी."
                      -------------
"फूल पर हँसकर अटक, तो शूल को रोकर झटक मत, 
ओ पथिक तुझ पर यहाँ, अधिकार सब का है  बराबर.''
                      ----------------
''आदमी को आदमी बनाने के लिए, 
                         जिन्दगी में प्यार की कहानी चाहिए,
 और कहने के लिए कहानी प्यार की, 
                         स्याही नहीं आँखों का  पानी चाहिए।''
                      ------------------
"जब  हृदय का एक आँसू, 
 नयन   सीपी में उतर  कर,
 वेदना   का   अश्रु   बनता, 
 एक   क्षण     पाषाण  भी 
 भगवान     बनता        है, 
 तब मधुरतम गान बनता है। "
                      -------------------
 ''जीवन जहाँ खत्म हो जाता !
  उठते-गिरते,
  जीवन-पथ पर
  चलते-चलते,
  पथिक पहुँच कर,
  इस जीवन के चौराहे पर,
  क्षणभर रुक कर,
  सूनी दृष्टि डाल सम्मुख 
  जब पीछे अपने नयन घुमाता !
  जीवन   वहाँ   ख़त्म हो जाता! "
                      --------------------
 ''कोई नहीं पराया, 
  मेरा तो आराध्य आदमी,
  देवालय हर द्वार है.
                मेरा दर्द नहीं है मेरा, 
                सबका हाहाकार है, 
                कोई नहीं पराया, 
                मेरा घर सारा संसार है।''
                        -------------

" चल रहा हूं मैं, इसी से  चल रहीं निर्जीव राहें, 
  राह पर चलती हमारे साथ ही मंजिल हमारी."  
                       ---------------
       "स्वप्न झरे  फूल से, मीत   चुभे शूल से, 
        लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से, 
        और हम  खड़े-खड़े   बहार   देखते रहे.
         कारवाँ   गुज़र   गया   गुबार देखते रहे."
                      -----------------
      " शोखियों में घोला जाये फूलों का शबाब, 
           उसमें फिर मिलाई जाये थोड़ी सी शराब, 
              होगा   जो   नशा   तैयार,  वह   प्यार  है."
                      ----------------
 " एक दिन   मैंने   कहा  यूँ  दीपv से, 
   तू   धरा   पर   सूर्य   का अवतार है, 
   किसलिए  फिर स्नेह  बिन  मेरे बता, 
    तू न कुछ, बस धूल-कण निस्सार है?
               लौ रही चुप, दीप ही बोला मगर
               बात  करना तक तुझे आता नहीं, 
               सत्य है सिर पर चढ़ा जब दर्प हो
               आँख   का परदा उधर पाता नहीं.
  मूढ़ ! खिलता फूल यदि निज गंध से
  मालियों  का  नाम फिर चलता कहाँ?
  मैं  स्वयं  ही  आग  से  जलता  अगर 
  ज्योति  का गौरव  तुझे  मिलता कहाँ ?"
                        ---------------
       ''सृजन  शान्ति  के  वास्ते  है ज़रूरी, 
        कि हर द्वार  पर  रोशनी  गीत  गाये, 
        तभी  मुक्ति  का vयज्ञ यह पूर्ण होगा, 
        कि जब  प्यार तलवार से जीत जाये।''

और अंत में एक कालजयी गीत की लाइनें

      "अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाये,
                  जिसमें इंसान  को  इंसान बनाया जाये."
       
               ऐसे महान साहित्यसेवी को शत् शत् नमन. 
                            🙏🙏🙏

डा. बिधान चंद्र राय -एक विलक्षण व्यक्तित्व

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  आज सारे देश में  ' राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस   (National Doctors day)' मनाया जा रहा है. यह दिवस  देश के जाने-  माने चिकित्सक और पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री  भारतरत्न डॉ. बिधान चंद्र रॉय की स्मृति में मनाया जाता है।   भारत में केंद्र सरकार  ने1991 में  1  जुलाई को 'नेशनल डॉक्टर्स डे ' मनाने का निर्णय किया था. उसी समय से भारत में 1 जुलाई (उनके जन्मदिन) को 'राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस' के रूप में मनाया जाता है
        आज  डॉ॰ बिधान चंद्र राय का की जयंती एवं पुण्यतिथि दोनों है. वे एक प्रसिद्ध चिकित्सक,  स्वाधीनता सेनानी एवं समाजसेवी थे. 
         डा.  राय का जन्म  पटना (बिहार) जिले के बांकीपुर गांव में हुआ था। उनके पिता श्री प्रकाश चंद्र राय डिप्टी कलेक्टर के पद पर  थे। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की।1905 में जब बंगाल का विभाजन हो रहा था जब बिधान चंद्र रॉय कलकत्ता यूनिवर्सिटी में अध्ययन कर रहे थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े और बंगाल की राजनीति में सक्रिय हुये.। इस दौरान  वे  महात्मा गांधी जी के व्यक्तिगत  चिकित्सक रहे। वे 1922 में कलकत्ता 'मेडिकल जरनल'  के संपादक  एवं बोर्ड के सदस्य भी बने। 
         उन्होंने  आज़ादी के संघर्ष में भी सक्रिय भाग लिया. भारतीय स्वतंत्रता सेनानी तथा राष्ट्रीय कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेता एवं गांधीवादी थे। उन्होंने 1926 को अपना पहला राजनीतिक भाषण दिया तथा 1928 में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य चुने गए। उन्हें 'बंगाल का मसीहा' भी कहा जाता है। 
          डॉ॰ बिधान चंद्र राय ने भारत की आजादी के बाद अपना पूरा जीवन चिकित्सा सेवा को समर्पित कर दिया। वे 1948 से वे 14  वर्षों तक पश्चिम बंगाल के  मुख्यमंत्री के रूप में चौदह वर्षों तक उसी पद पर रहे। डॉ. रॉय ने बंगाल में कई संस्थानों और 5 शहरों की स्थापना की। इनमें दुर्गापुर, कल्यानी, अशोकनगर, बिधान नगर और हाबरा शामिल है।
          1933 में ‘आत्मशुद्धि’ उपवास के दौरान गांधी जी ने दवायें लेने से मना कर दिया था। डा.बिधान चंद्र राय बापू से मिले और उनसे दवायें लेने का आग्रह किया. गाँधी जी उनसे बोले," मैं तुम्हारी दवाएं क्यों लूं? क्या तुमने हमारे देश के 40 करोड़ लोगों का मुफ्त इलाज किया है?" इस पर डा. राय ने उतर दिया," नहीं बापू! मैं सभी मरीजों का मुफ्त इलाज नहीं कर सकता। मैं यहां मोहनदास करमचंद गांधी को ठीक करने नहीं आया हूं, मैं उन्हें ठीक करने आया हूं जो मेरे देश के 40 करोड़ लोगों के प्रतिनिधि हैं।इस पर गांधी जी ने उनसे मजाक करते हुए कहा, तुम मुझसे थर्ड क्लास वकील की तरह बहस कर रहे हो।"
           डॉ. बिधान चंद्र रॉय देश के उन डॉक्टर्स में से एक थे जिनकी हर सलाह का पालन पंडित जवाहर लाल नेहरू भी पूरी सावधानी के साथ करते थे। इसकी चर्चा नेहरू जी ने ने 'वॉशिंगटन टाइम्स ' को 1962 में दिए एक इंटरव्यू में की थी. नेहरू जी के इलाज के लिए डॉक्टर्स का एक पैनल बनाया गया था, जिसमें रॉय शामिल थे। इंटरव्यू के बाद अखबार ने लिखा था - " डा. रॉय इतने  महत्वपूर्ण हैं कि नेहरू जी भी उनके प्रत्येक  मेडिकल निर्देश का पालन करते हैं."
           डॉ॰ बिधान चंद्र राय का 1 जुलाई 1962 को ह्रदयगति रुकने से निधन हो गया। सन् 1961 में उन्हें 'भारत रत्न' से सम्मनित किया गया। सन् 1967 में दिल्ली में उनके सम्मान में डॉ. बीसी राय स्मारक पुस्तकालय की स्थापना की भ‍ी गई। 
             ऐसे इतिहास पुरुष को विनम्र श्रद्धांजलि.

सियासत की खास बात

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  भारत के राजनीतिक पटल पर जहॉ एक ओर पूर्वोत्तर में हुये चुनावों में भगवा लहर दिखाई दी वहॉ उत्तर भारत में हुये उपचुनावों में सत्तारूढ़ भाजपा को गहरा झटका लगा. इस राजनीतिक उठा-पटक को देख कर लेखनी से कविता के रूप में मेरी जो प्रतिक्रिया प्रस्फुटित हुई जो कि निम्नवत् है-

"कोई हँस रहा है, तो कोई उदास है,
सियासत की, यही तो खास बात है.
          हमारी व्यवस्था को, क्या हो गया है,
          चुनावी गणित में ,' जन ' खो गया है.
ये वोटों का चक्कर, प्रमुख  हो गया है,
और जनता से नेता, विमुख हो गया है .
          सत्ता को जलवा, दिखाने की लत है,
          विरोधी को चिल्लाने  , की आदत है.
त्रिपुरा में वामी किला ,ढह गया  था,
विरोधी दलों का, दिल हिल गया था.
          नागालैण्ड,मेघालय ,मणिपुर कब्जे में,
          दिखाई थीै ताकत ,   हिंदुत्व ज़ज्बे ने.
भुनाया था ' हिंदुत्व' में ,'योगी' का चेहरा,
बँधा  था पूर्वोत्तर में, विजय  का  सेहरा.
           रिजल्ट उपचुनावों में,आया  है उल्टा,
           गणित सारा यू.  पी. ,बिहार में पल्टा.
इलाके में  योगी के,    भगवा  है    हारा,
मिला 'फूलपुर' मे , न जनता का सहारा.
           बिहार में लालू ने ताकत   दिखाई,
           कि सत्ता का चेहरा, हुआ है हवाई.
बहिन जी भी खुश हैं, भइया भी खुश हैं,
जमानत गँवा कर ,  गाँधी   भी  खुश  हैं.
           जनाधार खो  कर , वामी   भी खुश हैं,
           ये बसपा, सपा के ,सिपाही भी खुश हैं.
सत्ता की भँवों पर , खिचीं हैं लकीरें,
उन्नीस में मुद्दे , अब क्या- क्या उकेंरें.
           अहं  को पड़ा है, अब   तगड़ा तमाचा,
           जनतंत्र में जनता की होती यही भाषा."

धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर पर प्रतिबंध

2 टिप्‍पणियां:


        उ.प्र.में योगी सरकार के धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर पर प्रतिबंध के आदेश को लेकर राजनीति गर्मा गयी है.
        इस संबंध में धवनि प्रदूषण रोकने का हाईकोर्ट का पहले से ही निर्देश है . पिछली सपा सरकार ने भी कुछ ऐसा ही आदेश जारी किया था.
        प्रश्न यह उठता है कि सरकारें कितनी ईमानदारी से ध्वनि प्रदूषण रोकना चाहती हैं.
        हमारे देश में ध्वनि प्रदूषण फैलाने में धार्मिक स्थल व धार्मिक कार्यक्रम  एक बड़ी सीमा तक उत्तरदायी हैं. धार्मिक आयोजन जहॉ मन की शांति के लिये किये जाने चाहिये,वहॉ इनमें लाउडस्पीकर का प्रयोग आस पास के लोगों की नींद हराम करने का कारण बन जाता है. लोग कह नहीं पाते , पर मन ही मन आयोजक को गालियॉ व बददुआयें देते हैं.
        सारी रात चलने वाले  आयोजन बुजुर्गों, बीमारों व पढ़ने वाले बच्चों के लिये सिर दर्द साबित होते हैं. दुर्गा पूजा, गणपति पूजा,यज्य तथा उर्स ,मुहर्रम आदि पर की जाने वाली तकरीरें  आदि अवसरों पर तो हद ही हो जाती है.
       अत: प्रथम दृष्टया यह निर्णय स्वागत योग्य है यदि इसे निष्प छ रूप से लागू किया जाये.
पर आदेश यह है कि बिना इजाजत लाउडस्पीकर का प्रयोग नहीं किया जा सकता.इसी में गड़बड़ी होती है.  इजाजत देने के स्पष्ट मानक तय होने चाहिये. जो अधिकारी गलत मानकों का उल्लंघन कर किसी के रुतबे या प्रभाव में आकर इजाजत दे ,उस पर कठोर कार्यवाही होनी चाहिये.
        आने वाला समय अगले लोकसभा चुनाव की तैयारी का समय है.सरकारें किस तरह काम करतीं हैं ,यह देखना उत्सुकतापूर्ण होग

बस्ती बड़ी अजीब यहाँ की

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        जैसी आशा की जा रही थी, आज श्री लालू यादव को देवधर राजकोषागार मामले में सी सजा का ऐलान हो गया. कोर्ट ने साड़े तीन साल की सजा व पॉच लाख जुर्माने की सजा सुना दी.
         राजद को भी ऐसा पूर्वानुमान था ही,अत: ऐसा माहौल बनाया गया कि जैसे लालू जी शहीद होने जा रहे हैं और सिस्टम के द्वारा उन्हें पिछड़े वर्ग का  होने की सजा दी जा रही है. लालू ने भी समर्थकों से गरीबों के लिये हमेशा संघर्ष करते रहने की भावुक अपील की.
           हमारे देश में राजनीति कहॉ जा रही है? दोषी शर्मिंदा होने की जगह सीनाजोरी दिखा रहे हैं.यानी वे फिर आये तो पुन: इसी रास्ते पर चलेंगें. हमारे यहॉ समर्थक तो व्यक्ति पूजा में अंधे होते हैं,चाहे वे किसी दल के हों. 
          आज के दृश्यों को देख कर मुझे सुकवि विनोद निगम की कविता की पंक्तियाँ याद आ गयीं-
      " बस्ती बड़ी अजीब यहॉ की,
           न्यारी है तहज़ीब यहाँ  की,
              जिनके सारे काम गलत हैं,
                 सुबह गलत है ,शाम गलत है,
                     उनको लोग नमन  करते  हैं."

महानता की ओर अग्रसर हमारा देश

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कल पाक फ़ायरिंग में शामली ,उ.प्र. के निवासी हाजरा शहीद....

फिर एक सैनिक का बलिदान......

सरकार सोचती है कि सैनिक मरने के लिये होतेे हैं.....

विरोधी दलों को सरकार को कोसने का एक और मौका......
..............
आम आदमी किंकर्तव्यविमूढ़......

संवेदनशीलता....

औपचारिक और कुछ समय बाद जीरो विजिबिलिटी
.........

देश महान बनने की दिशा और  विकास ओर अग्रसर

बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी की पहली ई-बुक का विमोचन

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            दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, उरई के शिक्षाशास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो0 सत् चित् आनन्द द्वारा लिखित ई-बुक का विमोचन आज 6 सितम्बर 2012 को बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झांसी के कुलपति प्रो0 एस0वी0एस0 राणा के करकमलों से हुआ। यह बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झांसी की पहली ई-बुक है। प्रिसिंपल ऑफ एजूकेशननामक इस ई-बुक में प्रो0 सत् चित् आनन्द द्वारा बी00 प्रथम वर्ष के प्रथम प्रश्नपत्र के पाठ्यक्रम को समाहित किया गया है। विश्वविद्यालय कैम्पस में एक सादा समारोह में विमोचन करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति ने प्रो0 आनन्द के इस प्रयास की सराहना की और कहा कि आज के तकनीकी भरे दौर में इस तरह के कदमों की आवश्यकता है। इससे न केवल विद्यार्थियों को लाभ होगा वरन् विश्वविद्यालय तथा सम्बन्धित महाविद्यालय की गरिमा भी बढ़ती है। बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से सम्बन्धित इस पहली ई-बुक के आने से विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट का पुस्तकालय भी समृद्ध होगा। आने वाले दिनों में यदि विश्वविद्यालय और महाविद्यालय के समस्त प्राध्यापक अपने-अपने विषय से सम्बन्धित पाठ्यक्रम के आधार पर ई-बुक का निर्माण करें तो इससे विद्यार्थियों के समक्ष पाठ्यक्रम से सम्बन्धित अध्ययन सामग्री का अभाव नहीं रह जायेगा।

            बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झांसी की पहली ई-बुक के लेखक प्रो0 सत् सित् आनन्द ने बी00 प्रथम वर्ष के प्रथम प्रश्नपत्र पर आधारित अपनी इस पुस्तक के बारे में विस्तार से कुलपति और सभाकक्ष में उपस्थित समस्त लोगों को समझाया। प्रो0 आनन्द ने कुलपति महोदय को इस जानकारी से भी अवगत करवाया कि बी00 प्रथम, द्वितीय, तृतीय वर्ष के समस्त प्रश्नपत्रों के पाठ्यक्रम को ई-बुक के रूप में लाने का कार्य चल रहा है और शीघ्र ही ये समस्त ई-बुक विद्यार्थियों के अध्ययन हेतु उपलब्ध होंगी।




            बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष डॉ0 अरुण कुमार श्रीवास्तव ने प्रो0 आनन्द की जागरूकता की प्रशंसा की और कहा कि उन्होंने हमेशा छात्रहित के कार्य किये हैं और इस ई-बुक के निर्माण से भी छात्रों को लाभ पहुंचेगा। इसी के साथ डॉ0 श्रीवास्तव ने कुलपति महोदय का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके द्वारा विश्वविद्यालय की पहली ई-बुक का विमोचन किये जाने से अन्य जागरूक और सक्रिय प्राध्यापकों में भी उत्साह का संचार होगा और इसका लाभ समृद्ध पुस्तकालय के रूप में हमारे सामने आयेगा।
            0प्र0 राजनीतिविज्ञान परिषद् के प्रदेश अध्यक्ष डॉ0 आदित्य कुमार ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे तकनीकी भरे कार्य सदैव से प्रो0 आनन्द के करकमलों से होते रहे हैं। आज इस ई-बुक के रूप में बुन्देलखण्ड के शैक्षिक वातावरण के लिए एक मील का पत्थर रखा गया है। आने वाले दिनों में प्रो0 आनन्द के इस कार्य से प्रोत्साहन लेकर अन्य प्राध्यापक भी बुन्देलखण्ड के शैक्षिक वातावरण को उन्नत करने में अपना योगदान देंगे।
            गांधी महाविद्यालय, उरई के शिक्षाशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ00 पी0 शर्मा ने कहा कि आज का दिन समूचे बुन्देलखण्ड के लिए गौरव का दिन है और व्यक्तिगत रूप से हमारे लिए इसलिए भी गौरव और प्रसन्नता का विषय है कि विश्वविद्यालय की पहली ई-बुक उनके अपने विषय में आई है। कुलपति जी के सकारात्मक रवैये से आने वाले दिनों में अन्य विषयों में भी ई-बुक की रचना की जायेगी।
            ई-बुक के विमोचन समारोह में उक्त लोगों के अतिरिक्त प्रो0 सत् चित् आनन्द की धर्मपत्नी श्रीमती सुमन आनन्द, डी0वी0 कॉलेज, उरई की संगीत विभागाध्यक्ष डॉ0 वीणा श्रीवास्तव, बूटा महामंत्री डॉ0 टी0 के0 शर्मा, विश्वविद्यालय कैम्पस, समाज अध्ययन विभागाध्यक्ष डॉ0 नईम बॉबी, स्ववित्तपोषित महाविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष डॉ0 राजीव कुमार, पी-एच0डी0 होल्डर्स एसोसिएशन के संयोजक डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर सहित कई अन्य प्राध्यापक तथा विश्वविद्यालय कर्मचारीगण भी उपस्थित रहे।


अब बुन्देलखण्ड के समाचार "जय बुन्देलखण्ड" पर

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बुन्देलखण्ड से सम्बंधित समाचारों का प्रकाशन आज एक जनवरी २०१२ से जय बुन्देलखण्ड नामक ब्लॉग पर होगा। कतिपय कारणों से यहाँ अब प्रकाशन करना संभव नहीं हो पा रहा है। कृपया भविष्य में जय बुन्देलखण्ड पर ही समाचारों को देखें और यहाँ के क्षेत्र के हालचाल से परिचित हों।

रेडक्रॉस सोसायटी जालौन का निर्वाचन संपन्न

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आज दिनांक 2 दिसम्बर 2011 को जनपद जालौन की भारतीय रेडक्रास सोसायटी का त्रिवर्षीय निर्वाचन विकास भवन मीटिंग हॉल में सम्पन्न हुआ। अपर जिलाधिकारी की अध्यक्षता में सम्पन्न इस निर्वाचन में सर्वसम्मति से उरई शहर के युवा समाजसेवी अभय द्विवेदी को सोसायटी का सचिव चुना गया। इसके साथ ही कोषाध्यक्ष के लिए शिक्षक युद्धवीर कंथरिया को चुना गया। भारतीय रेडक्रास सोसायटी की प्रबन्धकारिणी कमेटी में पदेन सदस्यों-जिलाधिकारी, मुख्य चिकित्साधिकारी, उप-मुख्य चिकित्साधिकारी, जिला विद्यालय निरीक्षक आदि-के अतिरिक्त सचिव, कोषाध्यक्ष तथा पांच सदस्य शामिल होते हैं।


बोलते हुए नवनिर्वाचित सचिव अभय द्विवेदी

उपस्थित सदस्य

सदस्यों में से सचिव और कोषाध्यक्ष के निर्वाचन के बाद पांच सदस्यों का निर्वाचन भी सर्वसम्मति से किया गया। इसमें रामशरण जाटव, रेहान सिद्दीकी, डॉ0 अलका नायक, डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर तथा ज्ञानेन्द्र सिंह राजावत को चुना गया। प्रदेश प्रतिनिधि के रूप में अशोक द्विवेदी के नाम पर सभी सदस्यों में सहमति बनी। जनपद की सोसायटी की प्रबन्धकारिणी में पांच सदस्यों का मनोनयन जिलाधिकारी की ओर से किया जाता है। इन पांच नामों की घोषणा बाद में की जायेगी।

सेंटर फॉर द रिसर्च स्टडी ऑफ सोसायटी की नियमित मासिक बैठक का आयोजन

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मासिक बैठक == सेंटर फॉर द रिसर्च स्टडी ऑफ सोसायटी (CRSS)

स्थान == उरई (जालौन) दिनांक == 16-10-2011

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दिनांक 16 अक्टूबर 2011 को सेंटर फॉर द रिसर्च स्टडी ऑफ सोसायटी की नियमित मासिक बैठक का आयोजन सुशील नगर स्थित आदर्श एकेडमी में हुआ। ‘अन्ना का आन्दोलन: दिशा एवं दशा विषय पर आयोजित विचार-गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे डॉ0 आदित्य कुमार ने अन्ना के आन्दोलन के दोनों चरणों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए वर्तमान में अन्ना टीम की कार्यप्रणाली का विस्तार से समझाया। उनका कहना था कि अन्ना टीम के अन्य सदस्य कहीं न कहीं अतिवादिता के शिकार हो रहे हैं, उन्हें इससे बचने की आवश्यकता है। जिस प्रकार से अन्ना टीम के अन्य दूसरे सदस्यों में और अन्ना के बयानों में अब मतभेद की स्थिति बनती दिख रही है वह आन्दोलन की दिशा को भ्रमित करेगी। अन्ना का एक टी0वी0 चैनल को दिये साक्षात्कार में यह कहना कि यदि कांग्रेस जनलोकपाल बिल को पारित करवा देती है तो वे कांग्रेस के पक्ष में प्रचार करेंगे, कहीं न कहीं भ्रष्टाचार के विरुद्ध शुरू किये गये एक अच्छे आन्दोलन को कमजोर करेगा।

राजनीतिक एवं चुनाव विश्लेषक डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने हिसार के चुनावों को संदर्भित करके अन्ना आन्दोलन की वर्तमान स्थिति का विश्लेषण किया। उनका मानना था कि हिसार में कांग्रेस की हार तो पहले से ही तय थी, ऐसे में अन्ना टीम द्वारा वहां पर किसी एक दल के विरोध में राजनीतिक लामबंदी सी करना कहीं न कहीं उनके आन्दोलन पर संदेह सा पैदा करता है। अन्ना टीम को अब इस बारे में विचार करना चाहिए कि अपने 12 दिनों के आन्दोलन के समाप्त होने के बाद से उनकी टीम ने ऐसा कौन सा कार्य किया है जिसके आधार पर पूरे आन्दोलन में जुड़े रहे युवाओं को उसी तीव्रता से जोड़े रखा जाये।

सोसायटी के सचिव राघवेन्द्र द्विवेदी का कहना था कि अन्ना टीम ने खुद को नीयति का निर्धारक मान लिया है जबकि ऐसा नहीं है, नीयति ही नेता का निर्धारण करता है। जिस तरह से अन्ना और उनकी टीम के बयान आ रहे हैं उससे लगने लगा है कि वे लोग कहीं न कहीं कांग्रेस विरोध में कार्य कर रहे हैं न कि जनलोकपाल बिल को लाने के सम्बन्ध में। केजरीवाल, किरन बेदी आदि ऐसे नाम हैं जो अपने कार्यकाल के दौरान कहीं न कहीं सरकार से, कांग्रेस से परेशान रहे हैं और उसी का आक्रोश वे इस रूप में निकाल रहे हैं।

संजीव कुमार का कहना था कि अन्ना आन्दोलन जिस तेजी से हम सभी के बीच अपनी जगह बनाता दख रहा था उसी तेजी से लग रहा है कि वो अपनी विश्वसनीयता खोने वाला है। बाबा रामदेव की तरह से ही सरकार अन्ना के आन्दोलन को भी कुचलने का रास्ता निकालने की जुगाड़ बना रही है, ऐसे में टीम अन्ना को प्रत्येक कदम फूंक फूंक कर रखने की आवश्यकता है। गोष्ठी के आयोजक जगत सिंह ने कहा कि अन्ना टीम का काम सराहनीय रहा है और चूंकि इस देश को भ्रष्टाचार से लड़ने वाला कोई अगुवा चाहिए था जो अन्ना के रूप में प्राप्त हुआ। इस कारण से सभी लोग बिना किसी भेदभाव के अन्ना के साथ जुड़ गये।

कौशल किशोर ने अन्ना टीम के प्रति विश्वास व्यक्त करते हुए कहा कि वे सारे सदस्य मिलजुल कर काम करेंगे तो ऐसा नहीं है कि सरकार से घबरा जायें। सरकार की मंशा तो हमेशा से ही उनके आन्दोलन को दबाने की रही है और जनता के सहयोग से ऐसा कर पाना सरकार के लिए सम्भव नहीं हो सकेगा। बी0एड0 के छात्र राघवेन्द्र का कहना था कि अन्ना टीम को इस समय भ्रष्टाचार के अलावा किसी और विषय पर बात करके मुद्दे से भटकने का कार्य नहीं करना चाहिए। यदि उनकी टीम के सदस्यों के बयानों में अथवा स्वयं सदस्यों में भटकाव आयेगा तो यह तय है कि इस आन्दोलन को सरकार दबाने से नहीं चूकेगी। इस अवसर पर सभी आये हुए सदस्यों के प्रति आभार सोसायटी के वरिष्ठ सदस्य शिवशंकर ने व्यक्त किया।

सोसायटी की बैठक की अगली तिथि 20 नवम्बर रविवार को निश्चित की गई है, जिसमें एक सर्वेक्षण से सम्बन्धित विषय पर, प्रश्नावली आदि पर चर्चा की जायेगी।